जीवन में वही करें जिसको करने में आपको आनंद आता है, मन खुश होता हो।
लोग क्या कहेंगे? समाज में क्या इज्जत रह जाएगी? यह सोंच जीवन को नर्क बनाये और आप घुट घुट कर जियें इससे बेहतर हैं आप अपने को जो अच्छा लगे वही करें क्योंकि ज़िन्दगी आपकी है और आपको ही निर्णय करना होगा।
मेरे अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसी को हासिल होती है जिसने जीवन में हर काम को करने के पहले थोड़ा विचार इस बात पर भी किया कि क्या यह काम करके मुझे आत्मिक संतोष, आनंद मिलता है?
अभी मैं पी डी ऑस्प्रेंस्की की किताब ‘In search of the miraculous : Fragments of the Unknown teachings” पढ़ रहा हूँ और इसमें फ़्रेंच संत जॉर्ज गुर्जिएफ़ के एक लेक्चर को क्वोट किया गया है जिसमें गुर्जिएफ़ भी यही कहते हैं कि व्यक्ति जो भी काम करे मन लगाकर करे, अपने आपको पूरा झोंककर करे, और करके उसका मन खुश होता हो की वह जो कर रहा है वह उसके लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है- तो वह व्यक्ति आश्चर्यजनक रूप से भीतर की गहराइयों में अनजाने ही उतर जाता है जो किसी धार्मिक कृत्य या वृत्त उपवास इत्यादि से भी संभव नहीं।
मेरे जीवन का उदाहरण देकर इसको स्पष्ट करना चाहता हूँ क्योंकि मेरे जीवन में मैंने ऐसा ही किया जबकि मैं ग्रेजुएट इंजीनियर होकर भी इंजीनियरिंग डिप्लोमा के योग्य तृतीय श्रेणी कर्मचारी के पद पर बीस साल से अधिक समय तक सेवा देता रहा सिर्फ इसलिए क्योंकि मुझे मेरे काम पर गर्व था।
मुझे कई लोगों ने सुझाया कि मैं ऊंचे पद के लिए परीक्षा दूं तो पास होने की योग्यता रखता हूं, लेकिन मुझे अपना काम इतना पसंद था कि मुझे कभी उनके सुझाव पसंद नहीं आए।
आज यह पोस्ट लिखने का कारण यह है कि अभी हाल ही मैं मेरी मुलाकात ऐसे शख्स से हुई जो मेरी नौकरी की शुरुआत में मेरे आदर्श रहे। उनसे प्रेरणा लेकर मैंने कई डिग्री कोर्स में एडमिशन लिया लेकिन किसी को भी पूरा नहीं कर पाया। किंतु मैं हर वर्ष वर्कशॉप और शोर्ट कोर्स करता रहा जो मेरी प्रकृति के अनुरूप भी था।
उनसे इस बारे में भी चर्चा हुई कि जो साथी परीक्षा देकर ऊँचे पद पर पहुँच गए थे। आज हम सभी रिटायर हो गए हैं लेकिन मैं देखता हूँ कि हम सभी अपने काम से खुश थे चाहे हमारी धाराएँ अलग अलग थीं और आज तीनों अच्छा जीवन जी रहे हैं।
बात सिर्फ़ इतनी है कि हम अपने पसंदीदा काम को करने के लिए जो जरूरी सैक्रिफाइस करने होते हैं उनको नहीं करते क्योंकि समाज क्या कहेगा? परिवार से यदि अलग होकर ही उसे करना संभव हो तो हमसे परिवार और अपना स्थान नहीं छूटता।
मेरे छोटे लड़के को बचपन से ड्राइंग पेंटिंग का शौक था तो उसे मैं बच्चों की कंपीटिशन में ले जाया करता था। एक कॉम्पीटिशन में मैंने उससे पूछा तुमने क्या बनाया तो उसने कहा स्टीम इंजन। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि कुछ डिम पहले ही मैंने उसे स्टीम इंजन दिखाया था उसके चारों तरफ़ घूमकर क्योंकि हमारी ट्रेन क्रासिंग के लिए आने वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी और हम इंजन से कुछ ही पीछे बैठे थे।
उसको मैंने उसी दिन कहा कि तुम ड्राइंग में ही अपना करियर बनाना। तो उसने पूछा इससे कितने पैसे कमा सकूँगा? तो मैंने कहा तुम्हारा खर्च निकल जाएगा और किसी को दान भी कर सकोगे।
उसने हैण्डीक्राफ्ट और डिज़ाइन में बी डेस की डिग्री ली। लेकिन परीक्षा की घड़ी तब आई जब उसके दादा जी ने उसको प्रस्ताव दिया की तुम्हारे लिए फर्नीचर का शो रूम खुलवा देंगे और पाँच लाख रुपए उसके अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए। उसने उसी दिन वह राशि उनको वापस कर दी और आज एक छोटी सी नौकरी कर रहा हैं जिससे बस घर का खर्च निकल जाता है, लेकिन काम उसके पसंद का है। रोज शाम को ताजा होकर आता है।
दूसरा उदाहरण मेरी पत्नी का है हालांकि उसको यह निर्णय ख़ुद लेने में बड़ी तकलीफ़ हो रही थी क्योंकि उसके पिता नहीं चाहते थे कि वह शादी के बाद अपने माता पिता की सेवा करे। उनको समाज का डर था तो मुझे रिस्क लेना पड़ी।
किंतु उसकी माँ को कैंसर हुआ तो उसको अधिक समय तक उनके यहाँ रहना पड़ा और चूँकि उसकी माँ बिल्कुल पढ़ी लिखी नहीं हैं और पिता बैंक में मैनेजर होकर यूनियन के नेता थे तो काफ़ी लोगों का आना जाना रहता था इसलिए मेरी पत्नी के साथ रहने से उनको पढ़ने लिखने के काम में उसकी मदद मिल जाती थी यानी उनकी कमजोरी छिप जाती थी। मेरी पत्नी को भी उनके लिए काम करने में ख़ुशी मिलती है और अपने बच्चों के प्रति उसका लगाव बिल्कुल नहीं के बराबर था। एक साल से कम उम्र का हमारा कोई भी बच्चा जब रात में बीमार होता तो मेरी नींद खुलती थी, उसकी कभी नहीं खुली इसका मुझे भी आश्चर्य होता था।
आज इतने साल ओशो इत्यादि को पढ़ने के बाद पता चला की कुछ महिलायें शरीर से महिलायें होती हैं लेकिन उनमें हार्मोन पुरुष के ज़्यादा होते हैं। ऐसी महिलाओं को राजनीति इत्यादि में बड़ी रुचि होती है और मेरे ससुर नेता थे तो इसलिए मेरी पत्नी की उनसे तालमेल बनती थी। मुझमें स्त्री के हार्मोन ज़्यादा होकर शरीर पुरुष का होने से मुझे बच्चों की, माता पिता की देखभाल में ज़्यादा रुचि रही।
आज क़रीब चौदह साल होने आए मेरी पत्नी आपने माता पिता की सेवा कर रही है। पिछले साल मेरे बड़े लड़के की शादी में मेरी पत्नी आई तो मेरा भी मिलना दो दिन के लिए हुआ हुआ। ऊपर का सेल्फी उसी समय का है। हमने निर्णय किया की जब भी भविष्य में अपनी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होंगे तब दोस्त की तरह साथ रहने का फैसला किया। मुझे भी अपने माता पिता की सेवा में आनंद मिलता था तो मैंने अकेले दोनों बच्चों को अकेले बड़ा किया साथ ही माता पिता, जो मेरे घर से कुछ दूर रहते थे, उनको भी ससहयोग देता रहा।
इतने साल में मेरी पत्नी मेरे साथ रहती तो शायद पागल हो जाती क्योंकि हमारे, यानी उसके खुदके, घर में उसका मन ही नहीं लगता था और पिता के घर से आती थी तो आते ही वापस जाने की तारीख़ पहले बताती थी।
मुझे पूरी उम्मीद है कि जब भी वह अपनी इच्छा से अपने घर आयेंगी, अपने बच्चों के साथ रहने में, उनके परिवारों के साथ रहने एमआरआई ख़ुशी महसूस करेगी तब उसको यह एहसास होगा की अपने काम को मन लगाकर करना कितना महत्वपूर्ण है और फिर अपने घर के काम भी वह उतने हो आनंद के साथ करेगी।
जब मुझे इंतजार करते हुए करीब आठ साल हुए थे तब मैंने Medium पर एक ब्लॉग पढ़ा था जिसमें अमरीका में एक पति ने अपनी पत्नी का चौबीस साल इंतज़ार किया और अंततः उसकी पत्नी अपनी इच्छा से उससे मिलने और साथ रहने आई।
असली प्रेम कई तरह की परीक्षा लेता है और कई बार जान देकर भी उसकी क़ीमत चुकानी पड़ी है।




