जाति जनगणना से बड़ी जमात बनेगी तभी जब नाक छोटी और दिल बड़ा करोगे।
डा. लक्ष्मण यादव जी ने पिछड़ा वर्ग के द्वारा इस देश में अपनी हिस्सेदारी, सम्मान और हक़ के लिए अब तक के जनगणना के प्रयासों का सिलसिलेवार वर्णन तो किया हो है, भविष्य के लिए ब्लू प्रिंट भी दिया है।
बकौल डा लक्ष्मण यादव “जाति जनगणना को लेकर सभी के मन में धारना तो है जैसे जिनको फायदा हुआ वो पक्ष में हैं और जिनको फायदा नहीं मिल सका वो इसके विपक्ष में हैं, लेकिन उनके पास इसकी सूचना नहीं, तथ्य नहीं है जिसपर कसौटी कसकर देखा जा सके की कौन सही है उस कमी को पूरा करती है ये किताब.” और किताब के टाइटल पर उनका कहना है कि “बीमारी है “जाति” और निदान (डायग्नोसिस या एक्स रे) है “जनगणना”.
“जाति जनगणना, जात से जमात की ओर” इस शीर्षक से हाल ही में प्रकाशित और बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ती डा लक्ष्मण यादव जी की किताब को पढ़कर लगा की कबीर और फुले जो सपना देखे उसको कोई हकीकत में बदलने की ब्लू प्रिंट लिख गया है।
अक्सर सामंतवादी ताकतें ऐसे मौकों पर पिछड़ी जातियों या एससी/एसटी के सहयोग से ऐसी योजनाओं पर पानी फेरती आयीं हैं। लेकिन ब्लू प्रिंट की इतनी कॉपियाँ छापकर बिक गईं हैं की कोई ना कोई फिर से उसका उपयोग करके सपने को साकार कर ही देगा।
यह कुछ कुछ ऐसा हैं जैसे पैगंबर मोहम्मद ने क़ुरान के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैलायी और घोषणा की कि कोई बादशाह होगा जो विश्व को कुस्तुनतुनिया के अत्याचारों से मुक्ति दिलायेगा।
और बादशाह अहमद ने वह कर दिखाया। बाक़ी सब इतिहास है।
डा लक्ष्मण यादव जी ने अपनी इस किताब “जाति जनगणना, जस्ट से जमात की ओर” में पिछड़ी जातियों की समाज में अपने उचित हिस्सेदारी और सम्मान पाने की इस लंबी क़वायद में हर उस व्यक्ति के योगदान को बड़े सम्मान के साथ प्रस्तुत किया है। और हर उस व्यक्ति जिसने इसमें रोड़ा अटकाया है या वह समूह जिसने रोड़ा अटकाने के लिए प्रेरित किया है उसको भी बड़ी निर्भीकतापूर्वक बताया है।
इसमें जहाँ पी एस कृष्णन जैसे सचिव का भी जिक्र है जो दलितों के मसीहा बनकर उभरे। और ऐसा उन्होंने आखरी में नहीं किया बल्कि आईएएस की नौकरी के पहले दिन से करते आए थे। पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं वाली कहावत चरितार्थ कर गए।
तो पाच सदस्यों वाली मंडल कमीशन की समिति के एक सदस्य पी एस नायक की काली करतूत भी हैं जिससे वे खलनायक की भूमिका में ज़्यादा दिखाई दिए। जबकि वे ख़ुद एससी समाज को रिप्रेजेंट कर रहे थे।
किताब “जाति जनगणना, जाति से जमात की ओर” पड़कर एक बात समझ में आई कि हजारों छोटी छोटी पिछड़ी जातियों को अपने आपसी मतभेद भुलाकर और बड़ी जनसंख्या वाली पिछड़ी जातियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक विचार को हकीकत में बदलने के लिए “जाति जनगणना” के हर चरण में पूरी तरह चौकन्ना रहकर अपना काम करना होगा। और बड़ी जनसंख्या वाली पिछड़ी जातियों के ताक़तवर समूह को अपनी नाक छोटी और दिल बड़ा रखकर नेतृत्व क्षमता का परिचय देना होगा।
तभी कबीर और फुले के सपने को साकार रूप में बदला जा सकेगा। उनके योगदान इस सैकड़ों वर्षों से लंबित क़वायद को यहाँ तक ले आए हैं लेकिन इसको अमली जामा आज के युवाओं को पहनाना होगा। और क्यों ना हो, वे हो इससे सबसे ज़्यादा लाभान्वित भी होंगे और अभी तक इसके नहीं होने के कारण सबसे ज़्यादा पीड़ित भी रहे हैं।
डा लक्ष्मण यादव जी के भगीरथ प्रयत्नों से छपी किताब “जाति जनगणना, जात से जमात की ओर” में उनके पूरे परिवार का भी अदृश्य योगदान रहा है। इसलिए आपके भी परिवार के सारे सदस्य इसे पढ़ेंगे, आपस में बैठकर इसपर चर्चा करेंगे, आसपास के लोगों को पढ़ने को देवेंगे और उनसे भी इसपर चर्चा करेंगे। तभी इस परिवार और इस किताब से जुड़े सभी लोगों के प्रयत्नों को सही दिशा मिल पायेगी।
आप यदि कंटेंट क्रिएटर हैं तो इसपर एक रील बनाकर पोस्ट करेंगे, ताकि यह किताब सभी लोगों की जानकारी में आ जाए।


